जब नहीं दिखती कहीं कोई उम्मीद, तब याद आते हैं डॉ केके सिन्हा

 

by Prabhat Khabar | Publish Date: 5/7/2016 6:01:34 AM | Updated Date: May 7 2016 5:08PM

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डॉ केके सिन्हा देश के जाने-माने न्यूराेफिजिशियन हैं. लोग कहते हैं-डॉ सिन्हा गॉड-गिफ्टेड हैं. जीनियस हैं. सुबह से रात तक मरीजाें काे देखने का वही जुनून, वही निष्ठा. व्यस्त इतने कि छह-छह माह बाद का भी नंबर बुक.

जब मरीजाें के सामने काेई रास्ता नहीं दिखता, उम्मीद नहीं दिखती ताे एक नाम याद आता है-वह है डॉ केके सिन्हा का. मीडिया आैर प्रचार-प्रसार से दूर रहनेवाले डॉ सिन्हा न्यूराे के ताे मास्टर हैं ही, इतिहास आैर संगीत के भी जानकार हैं. घर में एक से एक दस्तावेज. अपने पिता के हाथ से लिखी डायरी-संस्मरण काे उन्हाेंने सहेज कर रखा है.

नकी निजी लाइब्रेरी में मेेडिकल साइंस से लेकर इतिहास की दुर्लभ किताबें माैजूद हैं. याददाश्त बहुत तेज. पचास-साठ साल पहले की भी एक-एक तिथि ठीक से याद. धारा-प्रवाह बाेलने की कला में माहिर. देश-दुनिया की घटनाआें पर पैनी नजर.

अनुभवी हैैं, विजन है. अतिव्यस्त रहनेवाले डॉ केके सिन्हा ने अपने जीवन की यादगार घटनाआें, अनुभव के बारे में प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा से लगभग तीन घंटे की लंबी बात की. डॉ सिन्हा का विस्तृत इंटरव्यू अब तक न ताे किसी अखबार में आया है आैर न ही टेलीविजन पर. इस इंटर‌व्यू काे लिखते समय इस बात का ख्याल रखा गया है कि डॉ सिन्हा के बाेलने की शैली की माैलिकता बनी रहे, भाषा का प्रवाह न टूटे. इस इंटरव्यू में डॉ सिन्हा के जीवन से जुड़ी कई ऐसी जानकारियां हैं, जाे पहली बार लाेगाें के सामने आ रही हैं. पढ़िए विस्तृत बातचीत.

मनेर का एक बालक कृष्णकांत डॉ केके सिन्हा कैसे बन गया?

मेरा जन्म मनेर में हुआ था. वह बिहार में पटना जिले का इलाका है. एेतिहासिक जगह है. मेरे पिता शिक्षक थे. वहां का वातावरण देहाती था. बचपन भी उसी माहाैल में बीता. पढ़ने में हम ठीक थे. अच्छा नंबर लाते थे. जब यह तय करने का वक्त आया कि किस क्षेत्र में जाना है ताे यह निर्णय पिताजी ने ही लिया क्याेंकि वे टीचर थे, जानकार थे. अनुभवी थे.

अब ताे वे नहीं हैं. उन्हें गुजरे जमाना बीत गया. डॉ झा (डीके झा) वर्षों से मेरे साथ हैं, लेकिन ये भी उनसे नहीं मिल सके थे. इनकाे हम कुछ दिनाें पहले अपने गांव ले गये थे. इन्हें अपना वह कमरा भी दिखाया था, जहां मेरा जन्म हुआ था. उस कमरे काे हमने उसी हाल में छाेड़ दिया है, जिस हाल में वह मेरे जन्म के समय था. मेरा लगाव अभी भी उस जगह से बहुत ज्यादा है. हम हर साल हाेली में वहां जाते हैं. पांच-छह दिन वहां रहते हैं.

इसी बार नहीं जा पाये. हमारे यहां हाेली पारंपरिक तरीके से मनायी जाती है. ढाेल के साथ. पूरे गांव के लाेग आते हैं. देर रात तक चैता का कार्यक्रम चलता है. दूसरे दिन वापस चले आते हैं. यह परंपरा रही है. हमारा गांव बड़ा फेमस है. हिस्टाेरिकल जगह है. आज से नहीं, सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही. बुद्ध के समय में भी वह गांव था. एक बार गंगा पार करते वक्त बुद्ध ने कहा था-एअम मनिअरीपतनम (यह मनेर का इलाका है). वे ताे राजगृह से जुड़े थे.

उस समय ताे पाटलिपुत्र हुआ ही नहीं था. राजगृह में बार-बार आते थे. यह ताे इतिहास है उस इलाके का, अब ताे मनेर की आबादी डेढ़ लाख के आसपास है. वहां हिंदू हैं, मुसलमान हैं. हर जाति के लाेग मिल-जुल कर रहते हैंं. यह बात हाे गयी मेरे गांव के बारे में. अब बता रहा हूं कि कैसे मैंने गांव के बाद की पढ़ाई की आैर डॉक्टर बना. हमने मैट्रिक की परीक्षा फर्स्ट डिवीजन से पास की.

अच्छा नंबर लाया था. उन दिनाें पटना साइंस कॉलेज का बड़ा नाम था. लेकिन मेरे पिताजी ने किसी कारणवश मेरा नाम पटना साइंस कॉलेज में नहीं लिखाया. उन्हाेंने कहा, तुम बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में पढ़ाे. एडमिशन के पहले एक बार 1944 के दिसंबर में ही पिताजी मुझे बनारस लेकर गये थे. वहां विश्वनाथ मंदिर दिखाया था. कई आैर जगह भी ले गये थे. हम बीएचयू भी गये थे. वहां जाकर मालवीय जी से बहुत प्रभावित हुए थे. उस समय वहां मेडिकल कॉलेज नहीं था, आयुर्वेदिक कॉलेज था. वहां हमने कहा-ठीक है हम यहां साइंस पढ़ेंगे.

पिताजी ने हमारा नाम बीएचयू में लिखवा दिया. दाे साल तक हम बीएचयू में पढ़े. बीएचयू के इस दाे साल ने मेरी जिंदगी बदल दी. हम अविभाजित भारत की बात कर रहे हैं. हम वहां जुलाई 1946 में गये थे. उस समय हिंदुस्तान के अलावा दुनिया के कई देशाें से छात्र पढ़ने आते थे. उस क्षेत्र के भी छात्र पढ़ने आते थे जाे आज पाकिस्तान-बांग्लादेश के अंदर आता है. बीएचयू अॉल इंडिया यूनिवर्सिटी था. वहां दस हजार विद्यार्थी आैर एक हजार शिक्षक थे. जब हम वहां पढ़ते थे, उस समय डॉ राधाकृष्णन वहां के वाइस चांसलर थे.

डॉ केके सिन्हा देश के जाने-माने न्यूराेफिजिशियन हैं. लोग कहते हैं-डॉ सिन्हा गॉड-गिफ्टेड हैं. जीनियस हैं. सुबह से रात तक मरीजाें काे देखने का वही जुनून, वही निष्ठा. व्यस्त इतने कि छह-छह माह बाद का भी नंबर बुक.

जब मरीजाें के सामने काेई रास्ता नहीं दिखता, उम्मीद नहीं दिखती ताे एक नाम याद आता है-वह है डॉ केके सिन्हा का. मीडिया आैर प्रचार-प्रसार से दूर रहनेवाले डॉ सिन्हा न्यूराे के ताे मास्टर हैं ही, इतिहास आैर संगीत के भी जानकार हैं. घर में एक से एक दस्तावेज. अपने पिता के हाथ से लिखी डायरी-संस्मरण काे उन्हाेंने सहेज कर रखा है.

उनकी निजी लाइब्रेरी में मेेडिकल साइंस से लेकर इतिहास की दुर्लभ किताबें माैजूद हैं. याददाश्त बहुत तेज. पचास-साठ साल पहले की भी एक-एक तिथि ठीक से याद. धारा-प्रवाह बाेलने की कला में माहिर. देश-दुनिया की घटनाआें पर पैनी नजर.

अनुभवी हैैं, विजन है. अतिव्यस्त रहनेवाले डॉ केके सिन्हा ने अपने जीवन की यादगार घटनाआें, अनुभव के बारे में प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा से लगभग तीन घंटे की लंबी बात की. डॉ सिन्हा का विस्तृत इंटरव्यू अब तक न ताे किसी अखबार में आया है आैर न ही टेलीविजन पर. इस इंटर‌व्यू काे लिखते समय इस बात का ख्याल रखा गया है कि डॉ सिन्हा के बाेलने की शैली की माैलिकता बनी रहे, भाषा का प्रवाह न टूटे. इस इंटरव्यू में डॉ सिन्हा के जीवन से जुड़ी कई ऐसी जानकारियां हैं, जाे पहली बार लाेगाें के सामने आ रही हैं. पढ़िए विस्तृत बातचीत.

 

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1 Comment

  1. back strength
    September 23, 2016, 5:36 am

    Hello friends, its great paragraph about cultureand fully explained,
    keep it up all the time.

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